सोमवार, 2 जनवरी 2012

दिल सपने संजोने लगेगा

मत बतावो किसी को अपनी ख़ुशख़बरी
उसको दुख होने लगेगा।
ऊपर से वह ख़ुश दिखेगा, पर
उसका अन्तर रोने लगेगा।।

अपने घाव भी मत दिखावो किसी को, वह
उसमें उंगली पिरोने लगेगा,
तुम कराहोगे-तिलमिलावोगे,
वह तानकर सोने लगेगा।

सुनी-सुनायी बातें किसी से मत करना!
वह अफ़वाहों का माला पिरोने लगेगा,
झूठ का अम्बार लग जायेगा,
सच कहीं जाके कोने लगेगा।
ख़ुशफ़हमियों में हर व्यक्ति जीता है,
अपने हर शब्द लगे गीता है,
पर तारीफ़ में सावधानी बरतिए!
दिल सपने संजोने लगेगा।।
                                                          -विजय

रविवार, 1 जनवरी 2012

सपना और सच्चाई

स्वच्छ नीलाकाश में चिड़ियों का मस्त तिरना,
कोमल-रक्ताभ कोपलों पुष्पों के मध्य फिरना,
बचपन से मुझे लालसा के झूले में झुलाता है
निर्बन्ध-सीमाहीन दुनिया में बुलाता है।

हर रात सपने में भुजाएं तौल मैं उड़ता हूँ,
कभी श्याम, कभी स्वेत अश्व पर चढ़ता हूँ,
समुद्र की अतुल गहराइयों में मछलियों सा नग्न
आनन्द में तिरोहित और फिर स्वप्न भंग।

जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं से दो-चार,
बेलगाम-गतिमान ख़र्चे की घोड़ी पर सवार
मन प्रलोभनों के गहरे समुद्र में गोते लगाता है,
और फिर संभलते-संभलते अन्ततः बेपर्द हो जाता है।

आदिकाल से सपने और सच्चाई का यह अन्तर,
विचारशील हृदय को रख देता है मथकर,
कैसे होंगे वे जिनके सपने सच हुए होंगे!
इस मृत्युलोक में मरणोपरान्त जो जिए होंगे।।
                                                                         -विजय
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