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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

और मुखौटों पे ही इटलाता रहा

तमाम उम्र मैं ईमान ही ईमान गाता रहा
क्या ख़ौफ़े ख़ुदा से अपने को भरमाता रहा?

भूख से जब अंतड़ियां कुलबुलाने लगीं,
अंगूठा चूस के बच्चा दिल बहलाता रहा।

ग़ुसलख़ाने में जब ठंड से हड्डियां कांपी
ज़ोर-ज़ोर से चालीसा चिल्लाता रहा।

जब भी शिद्दत से तुम्हारी याद आई
मैं टहलता रहा और गुनगुनाता रहा।

बुज़ुर्गों ने बहुत कुछ किया समाज के लिए
और मैं उसी का सूद-व्याज़ खाता रहा।

दिल में तो दर्द का सुनामी था,
फिर भी हंसता-हंसाता रहा।

ख़्वाहिशें तो मेरी फ़हश हैं यारों!
शरीफ़ज़ादा हूँ दिल तड़पाता रहा।

मुखौटों पर मुखौटे मैंने बदले हैं
और मुखौटों पे ही इठलाता रहा।
                                                        -विजय

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

वाह क्या जवानी है

तमको मुझसे मुहब्बत है मैंने माना!
बात रक़ीब के ज़ुबानी है।

मैंने लम्हा-लम्हा तुमको जिया है
फिर ये क्यों बदग़ुमानी है।

सबके लिए शीरी मेरे लिए तल्ख़
इसके क्या मानी है?

जनम-जनम तक निभाने का वादा
बात ये पुरानी है।

हम रक़ीब से शादी रचाएंगे
अब ये नई कहानी है।

सुना है साक़ी ने मुझको पूछा था
चाल में फिर रवानी है।

शीशा भी तड़प के चटक जाए
वाह क्या जवानी है।
                                             -विजय

रविवार, 8 अप्रैल 2012

खिल उठी है ज़िन्दगी फिर

खिलखिलाती धूप निकली, चाँद शरमा सा गया।
खिल उठी है ज़िन्दगी फिर, जो अंधेरा था गया।।

आइने में शक्ल देखी, फिर जवां लगने लगा,
लो हवा का एक झोंका, चेहरा ये सहला गया।।

हौसला है कूद करके, यह समन्दर तैर लूँ,
बाजुओं में अब कहाँ से फिर वही दम आ गया।।

भूख खुलकर लग रही है, अंतड़ियां चलने लगीं,
बन्द था जो मर्तबानों में ग़िज़ा सब खा गया।।

बारिशों में धूल जैसे पत्तियों की साफ़ हों,
वक्त का अवसाद धुलकर मन को फिर चमका गया।।

हैं अचम्भित आप सब ये यकबयक कैसे हुआ?
एक नन्हीं तोतली बोली से यह दम आ गया।।
                                                                                   -विजय

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

दर्द आख़िर दर्द है

ग़र निकल आयी ज़रा सी चीख तो क्या हो गया?
एहसास को कितना दबाऊँ दर्द आख़िर दर्द है।
हर हाल में हंसते रहे हर मौज़ में बहते रहे,
ऐसे मौज़ी फ़क्कड़ों का आज चेहरा ज़र्द है।।

आग से ही खेलने की एक लत जिसको लगी,
तलवे तो उनके गरम हैं पर हथेली सर्द है।
साफ़-सुथरे ढंग से करता जो घर की परवरिश,
आज के हालात में समझो कि असली मर्द है।।

देख करके भूख बीमारी और लाचारगी,
आँख जिसकी नम नहीं है वह बड़ा बेदर्द है।
ओढ़ करके सर से पा तक रेशमी मंहगे लिबास,
जिसका पानी मर गया पूरी तरह बेपर्द है।।

मत निहारो रास्ता उनका जो आगे कर गये,
सब चुनावी दाँव हैं कोई नहीं हमदर्द है।
गाँव के मेहनतकशों को देखकर हंसते ‘विजय’
सबका चूल्हा जो जलाये उसका चूल्हा सर्द है।।
                                                                              -विजय

रविवार, 8 जनवरी 2012

ख़यालात कुछ ऐसे

ज़िन्दगी शर्म से हो रही है पानी-पानी,
आज के हालात कुछ ऐसे हैं।


हराम हो-हलाल हो, पा लेना है,
लोगों के ख़यालात कुछ ऐसे हैं।।


ता’उम्र खोजते रहे जवाब पर पा न सके,
ख़ुदी और ख़ुदाई के सवालात कुछ ऐसे हैं।


यादों के सफ़े पे वो आये और हम खिल उठ्ठे,
ज़िन्दगी के मुलाक़ात कुछ ऐसे हैं।


कुछ भी ग़लत होता है तो, निकलते हैं उनके हाथ,
आज के नेताओं के हाथ कुछ ऐसे हैं।


ख़ून सने होने के बावज़ूद कमल कहलाते,
कहलाते ही रहेंगे इमकानात कुछ ऐसे हैं।


सारी मुख़ालिफ फिज़ाओं के बावज़ूद ‘विजय’
फ़र्ज़ में करें गरल आत्मसात कुछ ऐसे हैं।
                                                                     -विजय

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

हृदय उसका सर्वदा निर्मल रहा है


हृदय उसका सर्वदा निर्मल रहा है।
ईमानदारी का जिसे सम्बल रहा है।।


ईमानदारी और वह भी मुकम्मल,
अरे यारों! यह सभी को खल रहा है।


धर्म जिसके साथ उसको फ़िक्र क्या है,
मौज़ सारी ज़िन्दगी पल-पल रहा है।


जीत में कोई खुशी हासिल न होगी,
जीतने में दांव यदि छल-बल रहा है।


दौड़ता ही रह गया जो ज़िन्दगी भर,
मरने पर भी पांव में हलचल रहा है।


बात क्या है के सरे बाज़ार जो,
खोटा सिक्का सर उठाये चल रहा है।


आँधियों, तूफ़ान से लड़ता रहा वो,
एक दीपक है जो अब भी जल रहा है।।
                                                            -विजय

बुधवार, 30 नवंबर 2011

हर पहचान दोस्ती नहीं होती


हर पहचान दोस्ती नहीं होती।
उनके मिलने से ख़ुशी नहीं होती।।


मिलते हैं तो बातें होती हैं
पर पहले सी दिल्लगी नहीं होती।


प्याज की तरह चेहरे पर तमाम पर्ते हैं,
ऐसे लोगों की मुझसे बन्दगी नहीं होती।


अच्छाई की कद्र ग़र होती,
दुनिया में इतनी भद्दगी नहीं होती।


पढ़ाने वाले अग़र बाशऊर होते,
पढ़ने वालों में ये बेहूदगी नहीं होती।


हर चीज़ अग़र बाज़ार में बिकती होती,
तो कुछ भी बेशकीमती नहीं होती।


रिश्तों को उनका सम्मान मिलता,
तो सती जा के सती नहीं होती।।
                                                                -विजय

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

आज मौसम फिर बदलने लग गया


आज मौसम फिर बदलने लग गया।
शान्त मन फिर से मचलने लग गया।।


धूप कल तक तो बहुत प्यारी लगी,
खुला आँगन आज खलने लग गया।


घर हमारा पत्थरों का था बना,
गर्म सांसों से पिघलने लग गया।


मेरी उंगली थाम के जो चलता था,
उसको थामे कोई चलने लग गया।


डूबता सूरज समन्दर में दिखा,
चाँद बाहर को उछलने लग गया।


हर किसी ने क्यों मेरी तारीफ़ की,
हर कोई मुझसे ही जलने लग गया।


बहुत चाहा प्यार फिर भी न मिला,
दर्द से ही दिल बहलने लग गया।


बहुत चाहा उम्र को रोके रखूँ,
हर एक पल, पल-पल फिसलने लग गया।
                                                                -विजय
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