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सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

दोहे-

‘भाई-भाई सकल जग’ कहता पाक़ कलाम।
दहशतगर्दी कृत्य से, शरमिन्दा इस्लाम।।

फ़िक्रे ख़ुदा में रम रहे, सकल मास रमजान।
उसमें ही बम फोड़कर किया घिनौना काम।।

झांको थोड़ा पलटकर, माज़ी में रहमान।
वंशवेलि मिल जायगी, हममें एक समान।।

दिल को जीते प्यार से, हज़रत का पैगाम।
निर्मम हत्या तुम करो, लेकर उनका नाम।।

वहशी-क़ातिल क्या कहूँ? लानत तेरे नाम।
ख़ूनी रिश्ते को किया, शर्मसार बदनाम।।


गिने-चुने सिरफिरे हैं, सकल क़ौम बदनाम।
नये ख़ून में भर दिया, किसने ज़हर तमाम।।

                                                                       -विजय

शनिवार, 14 जनवरी 2012

आज के दोहे-

सत्य-अहिंसा रह गयीं, बातें केवल आज।
हिंसक, झूठे, भ्रष्ट सब पहने हैं अब ताज।।

शान्ति कमेटी के प्रमुख, गुप-चुप बुनते जाल।
दो वर्गों को लड़ाकर, कैसे लूटें माल।।

राजनीति के आड़ में हो गये मालामाल।
लखपति कैसे हो गये, कल थे जो कंगाल।।

छपते हैं अखबार में, अक्सर जिनके नाम।
दिखते कितने सभ्य हैं, छपते देकर दाम।।

लेते धरम का नाम सब, मुल्ला और महन्त।
पाखण्डों को धरम कह, कहलाए सब सन्त।।

कितने मोटे हो गये, ये समाज के जोंक।
मन करता है भोंक दूं, तोंद में बर्छी-नोक।।

बापू तुमने क्यों दिया, ये अनशन का मन्त्र।
हर कोई अनशन करे, ढीला हो गया तन्त्र।।

बिन कर्त्तव्य प्रबोध के, अधिकारों का ज्ञान।
सर्वनाश ही कर रहा, यह विष-वेलि समान।।
                                                                              -विजय
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