आज मौसम फिर बदलने लग गया।
शान्त मन फिर से मचलने लग गया।।
धूप कल तक तो बहुत प्यारी लगी,
खुला आँगन आज खलने लग गया।
घर हमारा पत्थरों का था बना,
गर्म सांसों से पिघलने लग गया।
मेरी उंगली थाम के जो चलता था,
उसको थामे कोई चलने लग गया।
डूबता सूरज समन्दर में दिखा,
चाँद बाहर को उछलने लग गया।
हर किसी ने क्यों मेरी तारीफ़ की,
हर कोई मुझसे ही जलने लग गया।
बहुत चाहा प्यार फिर भी न मिला,
दर्द से ही दिल बहलने लग गया।
बहुत चाहा उम्र को रोके रखूँ,
हर एक पल, पल-पल फिसलने लग गया।
-विजय