शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

आज मौसम फिर बदलने लग गया


आज मौसम फिर बदलने लग गया।
शान्त मन फिर से मचलने लग गया।।


धूप कल तक तो बहुत प्यारी लगी,
खुला आँगन आज खलने लग गया।


घर हमारा पत्थरों का था बना,
गर्म सांसों से पिघलने लग गया।


मेरी उंगली थाम के जो चलता था,
उसको थामे कोई चलने लग गया।


डूबता सूरज समन्दर में दिखा,
चाँद बाहर को उछलने लग गया।


हर किसी ने क्यों मेरी तारीफ़ की,
हर कोई मुझसे ही जलने लग गया।


बहुत चाहा प्यार फिर भी न मिला,
दर्द से ही दिल बहलने लग गया।


बहुत चाहा उम्र को रोके रखूँ,
हर एक पल, पल-पल फिसलने लग गया।
                                                                -विजय

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

महाकाश में एक अकेला

महाकाश में एक अकेला,
विचर रहा हो पाँखी जैसे।
घने तिमिर में रश्मि खोजता,
भटक रहा हूँ मैं भी वैसे।।


अपने ही द्वन्द्वों से अब तक,
जूझ रहा हूँ एक अकेला।
आस-पास जो घटित हो रहा,
वह तो है दुनिया का मेला।।


ऐसा कोई खेल नहीं है,
जिसको मैंने कभी न खेला।
दुनिया के इस रंगमंच पर,
गुरू बना मैं, बना मैं चेला।


सुख-दुःख के इस धूप-छाँव को,
मैंने एकाकी ही झेला।
एक दिवस इस महाशून्य में,
खो जाऊँगा मैं भी वैसे।
महाकाश में एक अकेला,
विचर रहा हो पाँखी जैसे।।
                                             -विजय
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