हर पहचान दोस्ती नहीं होती।
उनके मिलने से ख़ुशी नहीं होती।।
मिलते हैं तो बातें होती हैं
पर पहले सी दिल्लगी नहीं होती।
प्याज की तरह चेहरे पर तमाम पर्ते हैं,
ऐसे लोगों की मुझसे बन्दगी नहीं होती।
अच्छाई की कद्र ग़र होती,
दुनिया में इतनी भद्दगी नहीं होती।
पढ़ाने वाले अग़र बाशऊर होते,
पढ़ने वालों में ये बेहूदगी नहीं होती।
हर चीज़ अग़र बाज़ार में बिकती होती,
तो कुछ भी बेशकीमती नहीं होती।
रिश्तों को उनका सम्मान मिलता,
तो सती जा के सती नहीं होती।।
-विजय
क्या हुआ जो नज़र कमज़ोर हो चली
चाँद के दाग तो न दिखाई देंगे।
जो पास हैं उनपे तो तवज्जो होगा,
जब दूर वाले साफ़ न दिखाई देंगे।
तेज़ नज़रों के मीन-मेख से क्या पाया यारों,
जो साथ-साथ चलते थे उन्हें गंवाया यारों,
कमज़ोर नज़र अच्छी कम ही देखेगी
सबके नहीं बस अपने सनम देखेगी।
हर अक्स पर झीना पर्दा सा लगता है,
हर शख़्स कोहरे में लिपटा सा लगता है,
हर कली हौले-हौले मुस्काये,
तितलियों का उड़ना मौसिक़ी सा लगता है।
फिर नज़रों को लेकर परीशाँ क्यों हों
उम्र के साथ घटने की मसलहत समझो,
अब वक्त बाहर नहीं अन्दर झांकने का है
औरों की नहीं अपनी कमियां आंकने का है।
-विजय