शनिवार, 28 जुलाई 2012

यह ज़िन्दगी भी अज़ीब मेला है

वो कहां है, कैसा है, है भी कि नहीं,
ख़ुदा के वास्ते न सोच बड़ा झमेला है

कहीं पे राग-रंग कहीं पे ग़म का समन्दर,
यार! यह ज़िन्दगी भी अज़ीब मेला है।

ज़िन्दगी ने ठोकरें देकर जिसे सिखाया है,
वह न किसी का गुरू है न किसी का चेला है।

ख़ुद्दारी और सच्चाई का जिसने दामन थामा,
वह भीड़ में भी सदा अकेला है।

किसान का दर्द क्या समझें संसद वाले,
जेठ के ओले, सूखा सावन कहां झेला है।
                                                            -विजय

11 टिप्‍पणियां:

  1. किसान का दर्द क्या समझें संसद वाले,
    जेठ के ओले, सूखा सावन कहां झेला है।

    विजय जी,,,,आपने बिलकुल शी कहा,,,,,,

    RECENT POST,,,इन्तजार,,,

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  2. ज़िन्दगी ने ठोकरें देकर जिसे सिखाया है,
    वह न किसी का गुरू है न किसी का चेला है।

    ख़ुद्दारी और सच्चाई का जिसने दामन थामा,
    वह भीड़ में भी सदा अकेला है.....wakai anubhav hee sabse bada guru hai..sadar badhayee aaur sadar pranaam ke sath

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 06-08-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-963 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  4. बहुत सही कहा है आपने ... बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर ...
    बेहतरीन प्रस्तुति...

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  6. .

    ख़ुद्दारी और सच्चाई का जिसने दामन थामा
    वह भीड़ में भी सदा अकेला है

    बहुत सही कहा आपने
    आदरणीय डॉ. विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ जी !

    अच्छी रचना है …
    पोस्ट बदले हुए बहुत समय बीत गया…
    आशा है , स्वस्थ-सानंद हैं
    नई रचना का इंतज़ार है
    :)

    दीवाली की अग्रिम शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  7. "ख़ुद्दारी और सच्चाई का जिसने दामन थामा,
    वह भीड़ में भी सदा अकेला है।

    किसान का दर्द क्या समझें संसद वाले,
    जेठ के ओले, सूखा सावन कहां झेला है।"

    सीधी सच्ची और खरी बात

    उत्तर देंहटाएं

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