गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

महाकाश में एक अकेला

महाकाश में एक अकेला,
विचर रहा हो पाँखी जैसे।
घने तिमिर में रश्मि खोजता,
भटक रहा हूँ मैं भी वैसे।।


अपने ही द्वन्द्वों से अब तक,
जूझ रहा हूँ एक अकेला।
आस-पास जो घटित हो रहा,
वह तो है दुनिया का मेला।।


ऐसा कोई खेल नहीं है,
जिसको मैंने कभी न खेला।
दुनिया के इस रंगमंच पर,
गुरू बना मैं, बना मैं चेला।


सुख-दुःख के इस धूप-छाँव को,
मैंने एकाकी ही झेला।
एक दिवस इस महाशून्य में,
खो जाऊँगा मैं भी वैसे।
महाकाश में एक अकेला,
विचर रहा हो पाँखी जैसे।।
                                             -विजय

5 टिप्‍पणियां:

  1. रचना चर्चा-मंच पर, शोभित सब उत्कृष्ट |
    संग में परिचय-श्रृंखला, करती हैं आकृष्ट |

    शुक्रवारीय चर्चा मंच
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसा कोई खेल नहीं है,
    जिसको मैंने कभी न खेला।
    दुनिया के इस रंगमंच पर,
    गुरू बना मैं, बना मैं चेला।
    yun hi chalta hai samay ka khel

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपने ही द्वन्द्वों से अब तक,
    जूझ रहा हूँ एक अकेला।
    आस-पास जो घटित हो रहा,
    वह तो है दुनिया का मेला।।

    ...बहुत सच कहा है..बहुत सटीक और सारगर्भित अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुख-दुःख के इस धूप-छाँव को,
    मैंने एकाकी ही झेला।
    एक दिवस इस महाशून्य में,
    खो जाऊँगा मैं भी वैसे।
    महाकाश में एक अकेला,
    विचर रहा हो पाँखी जैसे।।

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

लिखिए अपनी भाषा में