शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

दर्द आख़िर दर्द है

ग़र निकल आयी ज़रा सी चीख तो क्या हो गया?
एहसास को कितना दबाऊँ दर्द आख़िर दर्द है।
हर हाल में हंसते रहे हर मौज़ में बहते रहे,
ऐसे मौज़ी फ़क्कड़ों का आज चेहरा ज़र्द है।।

आग से ही खेलने की एक लत जिसको लगी,
तलवे तो उनके गरम हैं पर हथेली सर्द है।
साफ़-सुथरे ढंग से करता जो घर की परवरिश,
आज के हालात में समझो कि असली मर्द है।।

देख करके भूख बीमारी और लाचारगी,
आँख जिसकी नम नहीं है वह बड़ा बेदर्द है।
ओढ़ करके सर से पा तक रेशमी मंहगे लिबास,
जिसका पानी मर गया पूरी तरह बेपर्द है।।

मत निहारो रास्ता उनका जो आगे कर गये,
सब चुनावी दाँव हैं कोई नहीं हमदर्द है।
गाँव के मेहनतकशों को देखकर हंसते ‘विजय’
सबका चूल्हा जो जलाये उसका चूल्हा सर्द है।।
                                                                              -विजय

6 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद उम्दा और शानदार अभिव्यक्ति।

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  2. बहुत सुन्दर आकके इस सुन्दर प्रविष्ट की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.in/ पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी लगा रहा हूँ!सूचनार्थ!
    --
    महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आग से ही खेलने की एक लत जिसको लगी,
    तलवे तो उनके गरम हैं पर हथेली सर्द है।


    शानदार अभिव्यक्ति. महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  5. दर्द मेरे पास भी
    था दौड़ कर आया.
    देख इतने जख्म यहाँ,
    वह खुद शरमाया.
    टिकने की कोई जगह
    न अब तक उसने पायी.
    पोर-पोर में अन्दर मेरे
    वह बेदर्द समाई.

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  6. गाँव के मेहनतकशों को देखकर हंसते ‘विजय’
    सबका चूल्हा जो जलाये उसका चूल्हा सर्द है।।

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं

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