मंगलवार, 9 अगस्त 2011

माटी की गंध लौट आती है

बौराई अमराई में कभी
कोयल की कूक जब सुनता हूँ,
माटी की गंध लौट आती है,
लड़कपन-उमंग लौट आती है।

वैसे तो बदल गया मन, चित
फिर भी वैसी ही है यह प्रकृति,
वर्षा की रातों में जुगुनू,
चमक-चमक जाते हैं लुक-छिप,
अंगूर और सेब तो अच्छे हैं,
पर यार! मन से हम बच्चे हैं,
एक-एक बेर की चिरौरी याद आती है,
फालसा और फरफररेवरी याद आती है।
                                            माटी की गन्ध लौट आती है...
वैसे तो व्यंजन बहुत हैं,
मन को मनोरंजन बहुत हैं;
पर यार हम अपने को क्या कहें
भूजा और भेली का सोंधापन
यादों के सारे दरीचे खोल जाती है।
                                            माटी की गन्ध लौट आती है...
वैसे तो अब मैं पढ़ाता हूँ,
पढ़े हुए पाठ दोहराता हूँ,
पर मुझको जिन्होंने
था पढ़ाया,
उनकी छपकी की मार याद आती है,
बाबू साहब की दहाड़ याद आती है,
मौली साहब की पुकार याद आती है।
                                            माटी की गन्ध लौट आती है।
                                            लड़कपन-उमंग लौट आती है।।
                                                                                      -विजय

9 टिप्‍पणियां:

  1. beete hue dino ki sirf yaaden hi rah jaati hain laut ke kabhi vaapas nahi aate.bahut achche man ke bhaavon ko ukerti kavita.bahut achchi.

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  2. वाह क्या बात है सर! बचपन की याद ताज़ी करने के लिए आभार...वो मौली साहब, बाबूसाहब...

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  3. विजय सर की कविता में, सोंधी सोंधी महक
    गाँव, बेरी, अमराइ भी, पढ़ा, मन गया लहक.

    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  4. http://www.parikalpnaa.com/2011/07/blog-post_31.html

    http://www.parikalpnaa.com/2011/08/blog-post_10.html

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह!!! अतिउम्दा प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  6. garmi ki chuttiyon mein beete nanihal ke dino ki yaad taza kar di aapne,,,bahut acchi kriti,,badhayee aaur sadar pranam ke sath

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