गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

हृदय उसका सर्वदा निर्मल रहा है


हृदय उसका सर्वदा निर्मल रहा है।
ईमानदारी का जिसे सम्बल रहा है।।


ईमानदारी और वह भी मुकम्मल,
अरे यारों! यह सभी को खल रहा है।


धर्म जिसके साथ उसको फ़िक्र क्या है,
मौज़ सारी ज़िन्दगी पल-पल रहा है।


जीत में कोई खुशी हासिल न होगी,
जीतने में दांव यदि छल-बल रहा है।


दौड़ता ही रह गया जो ज़िन्दगी भर,
मरने पर भी पांव में हलचल रहा है।


बात क्या है के सरे बाज़ार जो,
खोटा सिक्का सर उठाये चल रहा है।


आँधियों, तूफ़ान से लड़ता रहा वो,
एक दीपक है जो अब भी जल रहा है।।
                                                            -विजय

9 टिप्‍पणियां:

  1. दौड़ता ही रह गया जो ज़िन्दगी भर,
    मरने पर भी पांव में हलचल रहा है।
    बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

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  3. जीत में कोई खुशी हासिल न होगी,
    जीतने में दांव यदि छल-बल रहा है।
    bilkul sach baat hai sir...imaandari ke aage kisi ka jor nahi chalta hai..sadar badhayee aaur pranam ke sath..bahut dino se mere blog per aapke darshan nahi hue..aapka margdarshan jaruri hai

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  4. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 12-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  5. हृदय उसका सर्वदा निर्मल रहा है।
    ईमानदारी का जिसे सम्बल रहा है।।

    आँधियों, तूफ़ान से लड़ता रहा वो,
    एक दीपक है जो अब भी जल रहा है।
    बहुत सुन्दर रचनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बात क्या है के सरे बाज़ार जो,
    खोटा सिक्का सर उठाये चल रहा है।
    वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीत में कोई खुशी हासिल न होगी,
    जीतने में दांव यदि छल-बल रहा है।


    दौड़ता ही रह गया जो ज़िन्दगी भर,
    मरने पर भी पांव में हलचल रहा है।

    बहुत सुन्दर शुक्ल जी , मन को प्रभावित करने वाली पंक्तियाँ ........ आभार |

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  8. जीत में कोई खुशी हासिल न होगी,
    जीतने में दांव यदि छल-बल रहा है।

    ...बहुत खूब...सभी शेर मन को छू जाते हैं..

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