बुधवार, 14 दिसंबर 2011

ज़ोर से जो बज रहा थोथा चना है

ज़ोर से जो बज रहा थोथा चना है।
मौन का अब शोर से ही सामना है।।

हौले-हौले आह भर लो चीखो नहीं,
हिन्द में जनतन्त्र है चिल्लाना मना है।

देखते हो गगनचुम्बी भवन को,
यह शानो-शौक़त हमारे पसीने से बना है।

हर वो हाथ जिसको आज कमल कहते हैं,
रक्तरंजित है गुनाहों से सना है।

लड़कियों की शादियों में जो झुका था,
आज लड़के के लगन में कैसा तना है।

नक़ल करके पास होके साहिबी पायी,
कहीं पर गिड़गिड़ाएं कहीं पर कटखना है।

जश्न चारों ओर है शोर है,
पर न जाने आज क्यों मन अनमना है।
                                                               -विजय

4 टिप्‍पणियां:

  1. हौले-हौले आह भर लो चीखो नहीं,
    हिन्द में जनतन्त्र है चिल्लाना मना है।
    लड़कियों की शादियों में जो झुका था,
    आज लड़के के लगन में कैसा तना है।

    वह शुक्ल जी , सामाजिक कुरीतियों और देश की गम्भीर समस्याओं को समेटे हुए एक सार्थक रचना पर हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. लड़कियों की शादियों में जो झुका था,
    आज लड़के के लगन में कैसा तना है।

    वाह ..बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं

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