गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

पीड़ा


पीड़ा, अपमान, तिरस्कार,
अकेलापन, बेबसी, अत्याचार
बड़े मुक्तिदायी हैं अग़र बिंध जायें
करते हैं पूरे व्यक्तित्व का परिष्कार।


राम, परशुराम, पाण्डव, विश्वामित्र
प्रताणित होकर ही प्रखर बने
इस मुक्तिदायी पीड़ा से न गुज़रते
तो कौन गाता इनका चरित्र?


सीता अग्नि से भी प्रदाहक
परिस्थितियों में तपकर
सती साध्वियों की आदर्श बनीं
कोढ़ी के साथ कढ़कर ही
सावित्री की यम से ठनी,


निविड़ जंगलों के एकाकीपन ने
लव-कुश को तराशा था
अश्वमेघ का घोड़ा
भरत-शत्रुहन की फ़ौज
उनके लिए तमाशा था।


इन्द्रजित की अमोघ शक्ति को
लक्ष्मण ने सहा था
इस पीड़ा से ही प्रस्फुटित हुई थी
वह प्रचण्ड शक्ति
जो सौमित्र के धनुष से बहा था।


अपमान विभीषण को
अन्दर तक हिला गया
रावण को मौत,
उसको लंका का छत्र दिला गया।


चाणक्य इतिहास के अंधेरे में
ग़ुम हो गये होते,
महानन्द का अपमान अग़र
 चुपचाप सह गये होते।


बाबर बुरी तरह अपमानित होकर
ईरान से भागा था,
इस पीड़ा ने ही उसको
भारत की बादशाहत के लिए साधा था।


इतिहास में एक नहीं
हजारों उदाहरण पढ़े हैं
जिनको पीड़ा का दंश लगा
केवल वे ही बढ़े हैं।।
                                                 -विजय

6 टिप्‍पणियां:

  1. इतिहास में एक नहीं
    हजारों उदाहरण पढ़े हैं
    जिनको पीड़ा का दंश लगा
    केवल वे ही बढ़े हैं।।
    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. bahut khoobsoorat rachana hai sir ... char panktiyan Kavi Rahi ji ki yad aa gyeen

    Na samjh bn na hr or nirasha dekho .
    Mauj men doobo na opar se tamasha dekho .
    Jindgi dard ki pustak ise padh lena .
    Vyakarn chhod kr anubhuti ki bhash seekhoo .

    shayad pragati ka hr rasta peeda ki
    anubhutiyaon se hokar hi gujarta hai .

    bahut bahut abhar sir .

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 05-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  5. सच कहा आपने। जिनको पीड़ा का दंश लगा
    केवल वे ही बढ़े हैं...सुंदर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. पीड़ा जीवन की एक ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी है जिसके बिना हम प्रगति कर ही नहीं सकते हैं। महानता और पीड़ा एक सिक्के के दो पहलु लगते हैं । रचना में पीड़ा के महत्त्व को आप ने खूबसूरत उदाहरण के द्वारा प्रस्तुत किया है निश्चय ही पीड़ा की महत्ता के साथ ही रचना ने अपनी उत्कृष्टता को सिद्ध कर दिया है। …. सादर आभार आदरणीय शुक्ल जी ।

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