शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

पंचमढ़ी-

झरने-
सुखद-सुमधुर-सुकुमार,
चपल-वंकिम-रसधार,
अमल-निर्झर-शीतल फुहार,
अनादि-अनवरत-आवेष्ठित हार।
जंगल-
सौम्य-श्यामल-शीतल,
आच्छादित किये भूतल,
मूक ऋषिगण-जीवनाधार,
मानव का प्रथम आधार।
गुफ़ाएं-
गहरे-निविड़-शैलाश्रय
प्रकृति की अनोखी कृति,
ध्यानस्थ भोले महादेव
उठो! करो गरलपान
दग्ध है सकल सुकृति
विकल सत्य! आदिदेव!
त्राहिमाम! त्राहिमाम!
                                        -विजय 

3 टिप्‍पणियां:

  1. purntay sahitiyik rachna...maine sheershak padha to socha aaj aap pachmadhi ghumane le ja rahe hain..apne kedarnath kee yatra kee tarah...sir apne kuch aaur yatra britant daliye...sir meri rachnaaon ko ek jamaane se aapka margdarsha nahi mila mujhe behad harsh hoga yadi aap mera blog join karenge aaur meri rachnaaon me sudhar ke liye mujhe sujhav denge....sadar pranam aaur badhayee ke sath

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  2. बहुत ही खुबसूरत ढंग से पंचमढ़ी से परिचय कराया है आपने ..

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  3. घूमा तो मैं भी..पर अभिव्यक्त नहीं कर पाया।

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